शुक्रवार, 4 मार्च 2011

अब तक तो 4जी घोटाला भी खुल जाता जी


व्यंग्य
अब तक तो 4जी घोटाला भी खुल जाता जी

देश के नामी गिरामी लोगों के ग्रह इन दिनों ठीक नहीं चल रहे हैं। राजा रंक बन चुके हैं तो कलमाड़ी सहमे हुए बैठे हैं न जाने कब सादी वर्दी में सीबीआई आए और ससुराल ले जाए। कलमाड़ी क्या छोटे बड़े घोटाले कर के अब तक कालर खड़े करके घूमने वाले कई लोगों के कालर आज कल गिरेबान के ऊपर झूल रहे हैं। कई भाई लोगों के गिरेबान तक सीबीआई के हाथ पहुंचने ही वाले हैं तो कई के कालर इस जांच एजेंसी कभी भी ऐंठ सकती है। हालात को समझते हुए कलमाड़ी भाई ने आखिरी भभकी भी दिखा दी, पर होई है जो राम रचि राखा....वाली चैपाई शायद तुलसीदास जी ने उन्हीं के लिए ही लिखी थी। राजा भी ससुराल जाने से पहले ऐसे ही सीबीआई को घुड़की मार रहे थे, पर अब चुपचाप जेल की रोटी खा रहे हैं। परसों अखबारों ने छापा था कि राजा जमीन पर सोए, मेस की रोटी खाई, पढ़कर पत्रकार को कच्चा चबा जाने का मन करने लगा था। भले ही शेर भूखा मर जाए लेकिन वह घास कभी नहीं खाता ऐसे ही चाहे कितना बुरा वक्त आ जाए राजा जमीन पर नहीं सो सकता। वो तो नाम से भी राजा ही हैं.... अगर बंदा जमीन पर सो भी गया तो उस पर खबर लिखनी क्या जरूरी थी। राजा का नहीं कम से कम पुरखों के मुहावरे का तो ख्याल किया होता। अब कोई और मुहावरा गढ़ना होगा। गनीमत है राजा साहिब का केस उत्तर प्रदेश की पुलिस साल्व नहीं कर रही है वर्ना अब तक राजा साहब 2 जी से लेकर 4 जी स्पेक्ट्रम तक के सारे राज उगल चुके होते, क्या कहा 4 जी तो अभी आया ही नहीं तो क्या हुआ आप हमारी यूपी पुलिस की काबिलियत पर शक नहीं कर सकते, यह वही पुलिस है जो बड़े से बड़े के को पलक झपकते ही साल्व कर देती है, पर क्या करें जितने भी बड़े मामले होते हैं सबमें हाथ रिक्शा चालकों या फिर कूड़ा बीनने वालों का ही होता है, पहली बार यूपी पुलिस के हाथ राजा जैसी शख्सियत लगती तो इसमे कोई संदेह नहीं कि यूपी की काबिल पुलिस उनसे निकट भविष्य में होने वाले 4 जी स्पेक्ट्रम घोटाले के राज भी उगलवा कर ही छोड़ती। अब जरा कल्पना करें कि कलमाड़ी मामले को भी समय रहते यूपी पुलिस के हवाले कर दिया जाता तो क्या वे इस समय कोई बयान देने लायक बचते। आज केंद्र सरकार को लपेटने वाले कलमाड़ी इस समय खुद ही लिपटे पड़े होते कहीं। उनसे हमारी पुलिस अगले खेलों में होने वाले संभावित घोटालों के राज भी उगलवा की बाहर लिकलवा लेती। वह तो सीबीआई है जो आइये सर, बताइये सर की रट लगाए रहती है। यूपी पुलिस के सामने जो एक बार नहीं खुलता तो पुलिस अगली बार में उसे ही खोल देती है। यह अलग बात है कि एक दो पुलिस वालों के लिए माया कमजोरी है, पर इसका मतलब यह तो नहीं कि पृथ्वी लोक के सभी मायावियों की चप्पलें यूपी पुलिस साफ करती फिरे। पत्रकारों ने तो इस छोटी सी बात का भी बतंगड़ ही बना दिया। बहन जी की सुरक्षा में लगे जवान का फर्ज था कि वे साए की तरह उन के साथ रहे। चप्पलों में लगी धूल की वजह से बहन जी को एलर्जी हो जाती और वे जुखाम या बुखार का शिकार हो जातीं तो आप लोग सुरक्षा दल को ही कसूरवार ठहराते न। खैर यूपी पुलिस जानती है ऐसे लोगों से कैसे निपटना है। फैसला आन द स्पाट करने में भी हमारी पुलिस पीछे नहीं है। इसलिए कलम के सिपाहियों कानून के सिपाहियों से पंगा मत लेना। कलम तोड़ के कहां डाल दी जाएगी इसकी कल्पना मात्र से ही अपना तो दिल सहम जाता है।

शुक्रवार, 11 फ़रवरी 2011

योजना
बरसात का मौसम बीते छह महीने हो गए, सरकार बाढ़ से प्रभावितों की मदद के आंकड़े प्रचारित करने में लगी थी। प्रदेश के गृह सचिव अधिकारियों की बैठक ली।विकास योजनाओं के पूरा न होने से उनका गुस्सा सातवें आसामान पर था। जिलाधीशों को फाइनली आदेश दिया- समाज के आखिरी व्यक्ति तक योजनाओं का लाभ पहुंचाने के हर संभव प्रयास किए जाएं। बैठक समाप्त हुई। जिलाधिकारियों ने अपने-अपने जिलों में पहुंच कर उपमंडलाधिकारियों की बैठकें बुलाई। सरकारी विकास योजनाओं को समाज के अंतिम आदमी तक पहुचाने के निर्देश जारी कर दिए गए। एसडीएम भी अपने कार्यालय में दो घंटे तक तहसीलदार, पटवारियों की बैठक कर समाज के अंतिम व्यक्ति तक विकास योजनाओं का लाभ पहुंचाने की रणनीति बनाने में लगे रहे। बाहर दरवाजे पर बरसात से हुए नुकसान की राहत पाने के लिए इतवारु दो घंटे से साहब के द्वार पाल से एसडीएम साहब से मिलने देने की मन्नतें करता रहा। साहब के बैठक में व्यस्त होने के कारण वह एक बार फिर बिना राहत लिए वापस लौट गया....अंदर बैठक में समाज के अंतिम व्यक्ति की खोज जारी थी।

मंगलवार, 8 फ़रवरी 2011

प्री मेच्योर बच्चे का इंटरनेट युग में एक्सटेंशन
वक्त के साथ बहने वाले भले ही अधिसंख्य हों, लेकिन अपने ही जमाने और दुनिया में जी रहे इक्के-दुक्के लोग आज भी भीड़ का ध्यान अपनी ओर खींचते हैं। ऐसे ही एक शख्श से मेरी मुलाकात हुई लगभग आठ साल पहले। नाम था रत्न चंद निर्झर। नाम अच्छा सा लगा सो कुछ लंबी बातचीत भी की। यह उस वक्त की बात है जब मैं दैनिक भास्कर में हिमाचल प्रदेश के सोलन ब्यूरो कार्यालय का प्रमुख था। निर्झर से मुलाकात हुई, कुछ रुचिकर और अरुचिकर दोनों ही विषयों पर चर्चाएं हुईं। मैं पहली ही मुलाकात में ताड़ गया कि इस व्यक्ति के भीतर साहित्य का एक निरंतर बहता हुआ झरना झरता है। खैर निर्झर जी गए तो साथियों ने चेतावनी दी कि इस व्यक्ति के साथ ज्यादा रहे तो यह आपसे ही चिपक जाएगा। मैंने अनुसुनी कर दी, लेकिन एक खिंचाव सा लगा था उनकी सादगी और बातों में। दुनिया जहान से दूर वे कभी राहुल सांकृत्यायन की बात करते तो लगता उन्हें अच्छी तरह से जानते हैं, फिर अचानक प्रेमचंद पर आ जाते। उनसे पहली मुलाकात इस लिहाज से भी अच्छी कही जा सकती है कि उन्होंने इससे पहले मेरा नाम सुन रखा था। बस इतनी सी जान पहचान को उन्होंने इस अंदाज में प्रस्तुत किया कि जैसे बहुत पुराना संबंध हो। जो भी हो साथियों की चेतावनी का मुझ पर असर जरूर पड़ा, लेकिन यह डर चौबीस घंटे में ही प्राण त्याग गया। अगले दिन सोलन के माल पर टहलते हुए निर्झर से फिर सामना हो गया। उन्होंने एक दिन पुरानी मुलाकात की औपचारिकता को ताक पर रखते हुए सीधे ही हमला बोल दिया: क्यों चोरों कहां घूम रहे हो.... कई लोगों के सामने जब उन्होंने इस तरह संबोधित किया तो साथियों की चेतावनी मेरे कान के पर्दों पर टकराने लगी। वह सितंबर महीने के अंतिम दिन थे। खैर उन्होंने काफी हाऊस में चाय पीने के लिए कहा तो मैं किसी जादू से बंधा उनके पीछे हो लिया। चाय की चुस्कियों के बीच उन्होंने बताया कि काफी हाऊस के स्वामी भी गढ़वाल से ही हैं, उन्होंने बाद में उनसे परिचय भी कराया, यह अलग बात है कि मेरी उनसे पहली मुलाकात ही इतनी जोश भरी नहीं रही कि दोबारा हाय हैलो से आगे बढ़ पाती। खैर निर्झर ने उस दिन बताया था कि दो अक्तूबर को वे उपवास रखते हैं। मैंने समझा कोई व्रत या त्योहार आता होगा सो पूछ लियाः किस खुशी में!
उन्होंने बताया कि उस दिन लाल बहादुर शास्त्री जी का भी जन्मदिन होता है और इस दिन वे पिछले तीस सालों से व्रत रखते आ रहे हैं। यह जानकर मेरे मन में उनके प्रति श्रद्धा का समंदर हिलोरे मारने लगा। यह मेरे लिए चौकाने के वक्त था, लेकिन उन्होंने यह असाधारण सी बात इतने साधारण लहजे में कही थी, कि मेरा चेहरा भावों को लेकर गच्चा खा गया। आज के समय में जब आदमी छोटी छोटी बातों को लेकर अपने पुरखों को कोसने लगता है तब लाल बहादुर शास्त्री जी के जन्मदिन पर उपवास रखना अपने आप में सुखद आश्चर्य ही कहा जाएगा। बातचीत तो उस दिन उनसे काफी हुई, लेकिन मैं उपवास की उस जानकारी से बाहर निकल ही नहीं सका। मेरा मन बार बार उन्हें सेल्यूट करने का कर रहा था, लेकिन वे ठहरे निर्झर.....
इत्तेफाक से मुझे कमरा भी उनसे करीब पचास कदम पहले ही मिल गया, फिर क्या था वे बच्चों को पढ़ाने के बाद देर रात मेरे कमरे पर आ जाते़..... हाथ में रेडियो, कंधे पर थैला और थैले में दैनिक अजीत से अंग्रेजी ट्रिब्यून तक कई छोटे और बड़े समाचार पत्र। साहित्य पर उनकी जानकारी मुझे सोचने पर विवश कर देती।
घूमने के मामले में निर्झर का कोई सानी नहीं। वे पैदल-पैदल कई किलो मीटर का सफर आज भी तय कर जाते हैं। मुझे याद है एक दिन वे मेरे घर देहरादून आए। मुझे भी वापस लौटना था सो मैं भी उनके साथ चल दिया। उन्होंने कहा कि देहरादून के प्रिंस चैक की ओर से आईएसबीटी जाएगें, मैं फंस गया, इसके बाद उन्होंने किसी भी आटो को मुझे हाथ ही नहीं देने दिया, रात लगभग दस बजे हमने प्रिंस चौक से आईएसबीटी का पैदल सफर तय किया। मैं गाड़ी की बात करता तो वे हाथ में पकड़ी मूंगफली की थैली मेरी ओर बढ़ा देते। बस मूंगफली खाते- खाते सात आठ किमी का सफर उन्होंने मुझसे पैदल ही तय कराया। इसके बाद से मैंने उनके साथ पैदल चलने के प्रस्ताव को किसी न किसी बहाने टाल ही दिया।
एक बार तो उनके साथ के चक्कर में मेरे एक साथी के परिवार में कलह ही हो गया। सोलन में नौणी नामक स्थान पर कृषी एवं बागवानी विश्वविद्यालय है, उसके जन संपर्क अधिकारी थे पीडी भारद्वाज। उनकी तबीयत नासाज होने की जानकारी हमें निर्झर जी के माध्यम से मिली। उन्हें देखने जाना था सो हमने दैनिक भास्कर के उप संपादक यशपाल कपूर को साथ ले सुबह दस बजे से पहले उनके घर पहुंचने की ठानी। निर्झर ने हमें आश्वासन दिया कि पैदल बिल्कुल नहीं जाएगें और जल्दी ही वापस लौट आएगें। कपूर जी की धर्म पत्नी के दांतों में दर्द था सो उन्होंने वापस लौट कर डॉक्टर के पास जाने का कार्यक्रम धर्मपत्नी के साथ तय कर लिया। हम तीनों भारद्वाज जी के घर पहुंचे, उनके साथ कुछ समय बिताया और फिर वापस निकलने लगे कि निर्झर का पैदल चलने का कीड़ा कुलबुलाने लगा। उन्होंने हमें पहाड़ का रास्ता बताते हुए कहा कि इस रास्ते हम सड़क तक बहुत जल्दी पहुंच जाएंगे। हम उनके झांसे में आ गए। निर्झर के पीछे पीछे चलते हुए हम लगभग आधा घंटे बाद सड़क पर तो पहुंचे, लेकिन वहां बस स्टॉप न होने के कारण सोलन तक का सफर भी पैदल करने की नौबत आ गई। इधर कपूर साहब की पत्नी के फोन पर फोन और उधर निर्झर जी की पैदल यात्रा। कपूर साहब थे भी थोड़े रंगीन तबीयत के आदमी सो अपने ही साथ काम करने वाले सुखदर्शन ठाकुर के घर उनके खिलाफ मजाक मजाक में कुछ ऐसा बोल आए थे कि बेचारे ठाकुर जी की तबीयत बिगड़ गई। तब से सुखदर्शन उनसे बदला लेने की सोचा करते। कपूर साहब की पत्नी को वे दीदी कहा करते सो अचानक उनके घर फोन किया और कपूर साहब की पत्नी ने अपने दांत की पीड़ा से लेकर कपूर साहब के अब तक न आने का किस्सा सुना दिया। फिर क्या था ठाकुर के दिमाग में घंटी बज गई, उन्होंने कपूर साहब की धर्मपत्नी को मनगढंत कहानी सुना कर उनके दिमाग में बिठा दिया कि कपूर साहब अपनी महिला मित्रों के साथ किसी और दिशा में भटकते देखे गए हैं। अब क्या था भाभी, कपूर साहब को जल्दी आने के लिए कहें और हमारी यात्रा खत्म ही न हो। दोपहर को हारे थके घर पहुंचे तो बीमार भाभी ने कपूर साहब की ठीक खबर ली, उनसे यह साबित करते नहीं बना कि वे भारद्वाज जी को देखने हमारे साथ गए थे। सुना है पूरा दिन घर पर तनाव रहा। निर्झर ने यह सुना तो बहुत हंसे।

निर्झर न तो आज के समय के साथ चल सकते हैं न इस काल के लिए बने थे, सही मायने में उम्र के लगभग 51 साल बिता चुका यह शख्स आज के ई-मेल युग में चिठ्ठीपत्री युग का एक्सटेंशन है। जो आधुनिकता को अपनाना ही नहीं चाहता। उससे दूर भागता है। देश का कोई ही प्रदेश होगा जहां उनके पत्र मित्र न हों। कुछ तो ऐसे भी है जो हिंदी नहीं जानते लेकिन मित्रता की भाषा को उन्होंने भी समझा। मेरे नालागढ़ जाने के बाद उनसे मुलाकातों का सिलसिला टूट गया। कई दिनों से उनका मोबाइल फोन भी स्विच आफ था। एक दिन अखबारों में खबर पढ़ कर झटका लगा। लिखा था कि सोलन के रत्न चंद निर्झर नामक एक व्यक्ति ने चिठ्ठी पत्रियों का चलन बंद ही हो जाने के चलते अपना मोबाईल फोन बेच दिया है। वे चाहते है कि लोग चिठ्ठियां लिखने की पुरानी परिपाटी को न छोड़ें और कम से कम उन्हें तो चिठ्ठी ही लिखें। मुंह से वाह और आह दोनों साथ ही निकले थे। कई महीनों बाद हमने मन्नतें करके उनसे दोबारा मोबाईल फोन खरीदवाया था, जिसे उन्होंने शायद अब तक नहीं बेचा... कौन जाने फिर सनक चढ़े और फेंक दें।
सोलन में रहते हुए राहुल सांकृत्यायन जन्मदिवस, मुंशी प्रेमचंद जयंती उनकी ही प्रेरणा से हम जोरदार ढंग से मनाते। पर्चे पढ़ने के लिए साहित्यकार मिल ही जाते, कवियों के लिए तो सोलन की भूमि वैसे भी काफी उर्वरा रही है। निर्झर हमेशा कहते हमारे कवि एक कविता को दस दस सालों से सुनाए जा रहे हैं। इस मामले में मैंने निर्झर में एक इमानदारी देखी, वे यदि नई कविता नहीं लिख सके तो कवि सम्मेलन के मंच पर कविता नहीं सुनाते। माफी मांग लेते। काफी फरमाइशों के बाद वे कभी सुनाते तो अपनी वर्षों पहले लिखी खिंद कविता सुनाते। इस कविता को सुनाते हुए निर्झर भावों में बहने लगते हैं। खिंद माने गुदड़ी...... के ताने बाने को खोलती मां और हर ताने का परिचय देते निर्झर के शब्द, उनकी आँखें छलछला जातीं और सुनने वाले निशब्द पूरी कविता को सुनते। सुना है अब खिंद पर दिल्ली में किसी यूनिवर्सिटी में शोध हो रहा है।
सच्चाई का साथ छोड़ना उन्हें नहीं भाता। सोलन में रहते हमारी मित्रता हिमाचल पुलिस के युवा आईपीएस अधिकारी ज्ञानेश्वर सिंह से हो गई। वे भी निर्झर को बहुत सम्मान देते। हमें पता चला कि 28 नवंबर को निर्झर का जन्मदिन है, मैने ही आयडिया दिया कि इस बार उनका जन्मदिन मनाया जाए। एसपी साहब बोले 27 को रविवार है, समय का सदुपयोग भी हो जाएगा, फिर लोग थोड़े ही पूछेंगे कि जन्मतिथी क्या है। सुखदर्शन, पंडित संतराम जी, कपूर साहब आदि सब राजी हो गए पर निर्झर को कौन मनाए। खैर वे कार्यक्रम में आने पर इस शर्त पर राजी हुए कि कार्यक्रम में केक नहीं कटेगा, वे सब को अपने घर से बना कर लाए गए अरबी के पत्तों के पत्योड़ खिलाएगें और कार्यक्रम में कवि सम्मेलन होगा। एसपी साहब ने पुलिस लाईन के सभागार में कवि गोष्ठी का इंतजाम करा दिया। स्थानीय कवि बुला लिए गए, पुलिसकर्मी भी कवि सम्मेलन सुनने पहुंचे। निर्झर से पहले आने वाले हर कवि ने उन्हें जन्मदिन की मुबारकबाद दी। जब निर्झर की बारी आई तो उन्होंने रहस्य से पर्दा उठाया कि दरअसल उनका जन्मदिन आज यानी 27 को नहीं बल्कि 28 नवंबर को है। यह सुनकर मैं एसपी साहब का मुंह देखूं और वे मेरा। हम समझ नहीं पा रहे थे कि यह बताने की निर्झर को क्या आवश्यकता थी....पर सच शायद उन्हें कचोट रहा था। बाद के कवियों ने उन्हें प्री मेच्योर बच्चा कह कर तंज भी कसे। पर निर्झर सच बता कर खुश थे।

उन्हें पढ़ने का शौक है और लोगों को पढ़ाने में उन्हें असीम आनंद की अनुभूति होती है। अक्सर मेरे पास वे देश के कोने -कोने से नव प्रकाशित पत्रिकाओं को लेकर पहुंच जाते। निर्धारित मूल्य लेकर किताबें मुझे पढ़ने के लिए देते। उन्हें खबर मिलनी चाहिए कि नई पत्रिका प्रकाशित हुई है। वे दस या बीस कापियों का मूल्य डाक से लेखक को भेजेंगे और उन किताबों को एक -एक करके पाठकों तक पहुंचाएंगे।
एसपी साहब के द्वारपाल कैसे सकते हैं बताने की जरूरत नहीं। निर्झर जी का फोन आया तो परेशान थे: बोले पता नहीं ज्ञानेश्वर जी को किताबें मिली भी होंगी या नहीं। मैंने पूछा आप दे कर तो आए हैं। वे बोले... यार गया तो था उनसे मिल कर उन्हें किताबें देने.... पर दरवाजे से पुलिस वाले ने अंदर ही नहीं जाने दिया, डर के मारे उसके पास ही किताबें छोड़ आया। खैर वे किताबें ज्ञानेश्वर सिंह जी तक पहुंची पर उन्हें यह पता नहीं चला कि उन्हें कौन छोड़ गया। जब मैंने बताया तो वे बहुत हंसे। उसके बाद उन्होंने निर्झर जी को बुलाया, स्वयं दरवाजे पर खड़े होकर उनका इंतजार किया और निर्झर से अपने द्वारपाल को विशेष रूप से मिलवाया तथा अगली बार से बिना टोके अंदर भेजने की हिदायत दी।
निर्झर हैं ही ऐसे कि पुलिस वाले उनके भीतर छिपी खासियतों को कैसे पहचाने। बड़ी खिचड़ी दाड़ी, कई बार तो महीनों महीनों शेव नहीं करते। एक बार तो उसी हालत में मेरे घर देहरादून पहुंच गए। अब तो लगता है कुछ सुधार हुआ है। सब धर्मपत्नी का प्रताप है। धर्मपत्नी की बात चली तो बता दें कि निर्झर ठहरे फक्कड़ टाइप, शादी व्याह के सामाजिक बंधनों से कोसों दूर, उम्र बढ़ती जा रही थी शादी की कोई फिक्र नहीं। एक मित्र थे अरूण डोगरा....इन दिनों दैनिक जागरण के बिलासपुर प्रभारी हैं। डोगरा जी और दूसरे मित्रों के समझाने बुझाने पर शादी के लिए राजी हुए। लोक निर्माण विभाग में नई नई नौकरी लगी थी सो अंग्रेजी ट्रिब्यून में वैवाहिक विज्ञापन प्रकाशित कराया गया। लगभग एक महीने बाद अखबार ने सभी पत्र उनके पते पर भेज दिए। लगभग डेढ सौ पत्र रहे होंगे। मित्रों की ज्यूरी बैठी। लंबे सोच विचार के बाद आईजीएमसी शिमला में एक नर्स के प्रस्ताव को पसंद किया गया। दिए गए पते पर निर्झर जी की स्वीकृति भेज दी गई। तकरीबन पंद्रह दिन बाद जवाब आया। पत्र पढ़ कर पूरी ज्यूरी ने माथा पीट लिया। लिखा था... आदरणीय भाई साहब प्रणाम.....आपके आशीर्वाद से मैंने यहीं काम करने वाले एक चिकित्सक से विवाह करने का फैसला किया है। फलां तिथी को विवाह है आप छोटी बहन समझ कर आशीर्वाद देने अवश्य पहुंचें....।

निर्झर जी फिर कुंवारे रह गए। उन्हें अपने कुवांरत्व की इतनी चिंता नहीं थी जितनी अरुण डोगरा सरीखे दोस्तों को थी। अंततः अरुण की पत्नी की बड़ी बहन से निर्झर से विवाह हुआ, और दो जुड़वा बेटों समेत तीन बेटा बेटी हैं। भाभी की शक्ल हूबहू अपनी छोटी बहन से मिलती है। खैर यह पारीवारिक मामला है....निर्झर पारीवारिक होते हुए आज भी बंधनों से नहीं बंधे। यदा-कदा थैला-रेडियो उठा कर निकल पड़ने के लिए मचल उठते हैं। उनके थैले में अखबार और पत्रिकाओं के अलावा एक अदद टार्च और दैनिक आवश्यकताओं का सारा सामान मिल जाएगा।
जम्मू कश्मीर में चुनाव थे, चुनाव ड्यूटी के लिए ऐसे कर्मचारियों की आवश्यकता थी जो ऊर्दू जानते हों। हिमाचल में पांच सात लोग ही ऐसे थे जो इस अनिवार्य शर्त को पूरा कर सकते थे, लेकिन जम्मू-कश्मीर में मौत के मुंह में जाए कौन, सो सबने बहाने बना लिए। एक मात्र आवेदन गया निर्झर का। मैंने पूछा- पहले तो खतरे के बीच आप क्योंकर जाएगें दूसरे ऊर्दू कहां से सीखेंगे। तब उन्होंने राज खोला कि उन्हें ऊर्दू पढ़नी और लिखनी दोनों आती हैं। दूसरे मौत उनको आती है जो डरते हैं मैं तो कश्मीर को समझने के लिए जाना चाहता हूं...वहां के लोगों से मिलूंगा, संस्कृति समझूंगा आदि आदि.... इसके बाद उन्होंने कुछ दिन सरकारी प्रशिक्षण भी लिया, लेकिन दुर्भाग्यवश चुनाव में उनकी आवश्यकता नहीं पड़ी और निर्झर की मन की बात मन में ही रह गई। जो भी हो निर्झर का जन्मदिन अब हर साल मनाया जाता है, उस दिन साहित्यकारों पत्रकारों को भोज दिया जाता है। कवि गोष्ठी होती है साहित्य चर्चा होती है। अरुण इस कार्यक्रम की तीन सालों से व्यवस्था करते हैं। इस बार मैं भी शरीक हुआ था कार्यक्रम में। शिमला से मधुकर भारती जी, द्विजेंद्र द्विज, कृष्णचंद महादेविया और हिमाचल पत्रकार संघ के अध्यक्ष जयकुमार आदि शामिल हुए। मैं तो देरी से पहुंचा पर सबने बताया कि खूब आनंद के साथ मनाया गया निर्झर का जन्मदिन। निर्झर ने अपनी उम्र सबको बिरले अंदाज में बताई; वे बोले: मैं और कादंबनी हम उम्र हैं। कादंबनी का प्रकाशन 1960में शुरू हुआ और इनका जन्म भी उसी वर्ष का है।
जब उनकी नई नई नौकरी लगी तब हिमाचल के मुख्यमंत्री होते थे वीरभद्र सिंह। सिंह कर्मचारियों के दूरस्थ इलाकों में जाने में दिए जाने वाले बहानों से परेशान थे। निर्झर उनके आवास पर पहुंचे तो मुख्यमंत्री ने आने का कारण पूछा। निर्झर ने बता दिया कि स्थानांतरण करवाना चाहते हैं। इस पर वीरभद्र सिंह ने निर्झर को खूब खरी खोटी सुनाई, लेकिन जब प्रार्थनापत्र देखा तो उनकी आखें फटी रह गई। मंडी जिले के मैदानी क्षेत्र का रहने वाला यह लड़का अपना स्थानांतरण हिमाचल के दूरस्थ क्षेत्र पांगी में करवाना चाहता है। ताकि वहां के लोगों व कल्चर को समझ सके। आवेदन पत्र पढ़ कर मुख्यमंत्री ने निर्झर की सबके सामने जमकर सराहना की।
हमारी परंपरा है कि जो लोग हमारे बीच नहीं है हम उनकी स्मृति में आयोजन करते हैं। उन्हें मरणोपरांत सम्मानित करते हैं, लेकिन जीते जी उसे कोई भाव नहीं देते। निर्झर जैसे लोग दो युगों के बीच सेतु की तरह हैं। जो हजारों लाखों में बिरले ही होते हैं। इसलिए उन्हें मान व उनकी भावनाओं को सम्मान देना हमारा दायित्व है। ईश्वर करे उनका एक्सटेशन और एक्सटेंड हो जाए। ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग उनसे जुड़ कर उनके माध्यम से पिछले युग को सझ सकें। आप भी उनसे बात करके उनसे मित्रता करना चाहे तो यह नंबर नोट कर लें -09459773121.... न मालूम कब निर्झर को सनक चढ़े और वह अपने मि़त्रों को सिर्फ पत्र व्यवहार करने क फरमान सुना दें।

मंगलवार, 14 सितंबर 2010

क्या की जे

किसी को याद न आए तो भला क्या की जे,
किसी की याद सताए तो भला क्या की जे।।
वो बेवफा है बेरुखा है दगाबाज है बहुत,
पर ये दिल उसको ही चाहे तो भला क्या की जे।।
मित्रों बिस्तर की सलवटों को प्रयोग मित्रों ने अब तक बेचैनी को जाहिर करने के लिए किया है, यहां नया उपयोग देखें....
अर्ज किया है.....
अजीब रात है करवटों में कटी जाती है,
सलवटें बिस्तर पर न आए तो भला क्या की जे।
देश के हालात बिगड़ रहे हैं या सुधर रहे हैं यह तो दावे के साथ हमारे नीति निर्धारक भी नहीं कर सकते...
देखें
ढकने के लिए लोग को कपड़ा नहीं नसीब।
विकास दर आकाश में जाए तो भला क्या की जे।
और अंत में
सौ-सौ की दिहाड़ी में सौ दिनों का रोजगार।
सांसद अस्सी हजार पाएं तो भला क्या की जे।।

रविवार, 12 सितंबर 2010

प्रतिशोध

राजनीतिकारों पर और देश के गद्दारों
परसाठ साल किया हुआ शोध बाँट रहा हूँ।
गाँव के चौबारों में और दिल्ली के गलियारों में
आम आदमी का प्रतिशोध बाँट रहा हूँ ।
कुर्सी की आग में जलेंगे सारे एक दिन,
इसीलिये लोगों में विरोध बाँट रहा हूँ
जानता हूँ फ़र्ख न पड़ेगा कोई फिर भी,
हिजड़ों के गाँव में निरोध बाँट रहा हूँ॥

मंगलवार, 7 सितंबर 2010

नानी एक कहानी कह

नानी एक कहानी कह
सबकी है जब अपनी रातें
नींद नहीं क्यों आनी कह...

कैसी मस्जिद कैसा मंदर
सबके लिए है एक समंदर

फिर क्यों झांसे में आ जाती
अब झांसी की रानी कह...

बोझ जमाने भर का लादे
चश्मे चढ़ते आखों पर
क्यों पन्नों में ही खो गई
बच्चों की शैतानी कह...

फूलों सी रंगत चहेरों की
कितने बरस हो गए देखी थी
फीके चेहरे, रूखी बातें
क्यों बेरंग जवानी कह...

क्यों रोते हैं बच्चे जग कर
रात-रात को नींदों से
तेरी कहानी से गायब हैं
क्यों राजा और रानी कह...

शनिवार, 4 सितंबर 2010

अपने घर के आंगन में

कुछ अपने ठहरा ले भइया अपने घर के आंगन में,
जैसे सांप छिपा ले भइया अपने घर के आंगन में।


रोज-रोज की पत्थरबाजी से अब तू घबराता है,
पाकिस्तान बसाले भइया अपने घर के आंगन में।


कंधा देने को मुर्दे को मिलते हैं अब लोग कहां,
खुद की चिता सजा ले भइया अपने घर के आंगन में।


खेल-खेल में नोट छापना कलमाड़ी से सीख जरा,
एक आयोजन करवा ले भइया अपने घर के आंगन में।


गुलेल से निकले एक कंकड ने आंख फोड दी बच्चे की,
और आम उगाले भइया अपने घर के आंगन में।


तूने मां-बाप को पीटा तेरा बेटा देख रहा,
इक कुटिया बनवाले भइया अपने घर के आंगन में।

रविवार, 29 अगस्त 2010

आओ न कुछ बात करें


कुछ अटक रहा था मन में, खटक रहा था जैसा भी आया आपको सौंप रहा हूं.... देखें तो जरा

किसका घूंसा - किसकी लात, आओ न कुछ बात करें...
होती रहती है बरसात, आओ न कुछ बात करें।

अगर मामला और भी है तो वो भी बन ही जाएगा,
छोड़ो भी भी ये जज्बात, आओ न कुछ बात करें।

नदी किनारे शहर बसाना यूं भी मुश्किल होता है,
गांव के देखे हैं हालात, आओ न कुछ बात करें।

इक इक- दो दो घूट गटक कर सैर करेंगे दुनिया की,
पैसे देंगे कुछ दिन बाद, आओ न कुछ बात करें।

बूंद-बूंद ये खून बहा कर क्यों प्यासे रह जाते हो,
बांटे जीवन की सौगात, आओ न कुछ बात करें।

तुम गैरों के हो गए तो क्या! प्यार हमेशा रहता है,
कौन रहा जीवन भर साथ, आओ न कुछ बात करें।

नींदों को पलकों पर रख कर छत पर लेटे रहते थे,
फिर आई वैसी ही रात, आओ न कुछ बात करें।

कमर तोड़ती है सरकार चाहे जिसको कुर्सी दो,
कैसा फूल और किसका हाथ, आओ न कुछ बात करे।

शनिवार, 28 अगस्त 2010

इधर भी प्रोब्लम है भाई

उड़नतश्तरी का पर घूम कर आया तो पता चला कि उन्हें अपनी रचना के लिए एक अदद शीर्षक की जरूरत है। पढ़ कर अजीब लगा कि समीर जैसी शख्सियत को एक अदना सा शीर्षक नहीं मिल रहा है क्या विडंबना है कहीं जहां खूबसूरत बदन है तो वहां घाघरा नहीं और जहां घाघरा है वहां बदन ही नहीं। जो भी हो अपनी पे आते हैं। मेरा मामला समीर लाल जी से कुछ अलग है। उनके पास शीर्षक नहीं है तो मेरे पास रचना ही नहीं है। अब आप सलाह देंगे कि रचना और शीर्षक का आदान प्रदान कर लो। पर मित्रों यह भी संभव नहीं है। उनकी रचना अगर मेरे शीर्षक से मैच न कर पाई तो मेरी तो भद ही पिट जाएगी न इस संभ्रात जगत में (वैसे यह भी एक फंडा है कि अपनी चीज का दाम हमेशा दूसरे से ऊंचा ) । वैसे बता दूं कि यह शीर्षक कई साल से मेरे जेहन को दुख पहुंचा रहा है। दुख क्या दे रहा है कचोट रहा है। मुझसे लड़ रहा है। मुझे ताने दे रहा है। रातों को सोने नहीं देता और दिन में कुछ काम करने नहीं देता। मजेदार बात यह है कि शीर्षक मुझसे बातें करता है कि रचनाएं कैसी हों। कम्बख्त को बीस तीस रचनाएं सुना चुका हूं पर उसे पसंद ही नहीं आतीं। इसमें हीरोइन सैक्सी नहीं है। तो उसमें हीरो आम सा नहीं लगता। मन करता है कि उसे कह दूं कि तू आम खा पेड़ मत गिन। पर क्या करुं अपने जने को कोई कुछ कह भी नहीं सकता। डरता हूं आत्महत्या कर ले तो मै तो शीर्षक हंता कहलाने लगूंगा न। आपकों क्या पता कि शीर्षक कितनी मुश्किल से मिलता है... (समीर जी से पूछो जो आपसे पूछ रहे हैं।) शीर्षक मेरे पास है पर रचना नहीं इससे बड़ा दुर्भाग्य और क्या हो सकता है मित्रों। मेरे शीर्षक के लिए कोई कहानी हो तो आप मुझे जरूर लिखना... पर स्मरण रहे आपकी कहानी मेरे शीषर्क को पसंद आनी आवश्यक है। ऐसी कहानियां जिन्हें मेरा शीर्षक स्वीकार नही करेगा उन्हें वापस भेजना मेरे लिए दुष्कर होगा...इसलिए लिखी और भूल जाओ समझो।
कहानी लिखने से पहले कुछ शेरों पर नजर दौड़ा लें और मजा लें
कि जिनमें डूब गए थे हम वही मंझधार
गया तूफान तो देखा वो किनारे निकले।।
जिनपे उम्मीद थी ले जाएगें नदी पार हमें,
मगर जब निकले तो वे मेरे सहारे निकले।।
जिनके इश्क के चर्चे सुने थे घर-घर में,
मिले हमसे तो या खुदा वो कुंवारे निकले।।
हमें तो खौफ था गैरों पे डर झूठा निकला,
कि हमें मारा जिन्होंने वो हमारे निकले।।

सोमवार, 23 अगस्त 2010

तुम आओगे न... गिर्दा



65 साल की उम्र कोई ज्यादा नहीं होती और तुम इतनी ही लिखा लाए। पर जितना भी जिए शानदार जिए। तुम गिर्दा नहीं एक कहानी थे... एक अनवरत कहानी जिसका कोई अंत नहीं... बस आरंभ था। तुम्हे क्या लगता है कि तुमने जिंदगी के इन 65 सालों में अपनी जिंदगी जी। नहीं तुम एक युग जी गए... गिर्दा....। वो युग जो अब पहाड़ पर फिर लौट कर नहीं आएगा। क्या आदमी थे रे तुम... ठेठ पहाड़ी जीवन... वहीं ठसक ...वहीं कसक ... डटे रहने की रणभूमि में.... पहाड़ की तरह। मां पिता ने गिरीश नाम दिया... तुम्हे शायद जंचा नहीं सो गिर्दा हो गए। पूरी दुनिया के लिए ...गिर्दा... यानी गिरीश दा...। दादा यानी बड़ा भाई जो छोटों को हर गलती पर प्यार भरी डांट पिलाता है। पुचकारता है और फिर गलती न करने की नसीहत देता है।
सारा पानी चूस रहे हो , नदी संमदर लूट रहे हो
गंगा यमुना की छाती पर कन्कड़ पत्थर कूट रहे हो।।
महल चौबारे बह जाएगें, खाली रौखड़ रह जायेंगे,
बूँद बूंद को तरसोगे जब
बोल व्यापारी तब क्या होगा।नगद उधारी तब क्या होगा।।
गिर्दा.... नाम के अलावा तुमने और क्या लिया दुनिया से और दिया क्या- क्या... शायद तुमने इस पर गौर ही नहीं किया। तुम तो पहाड़ थे। तुम्हें क्या पता हीरे क्या हैं और जवाहरात क्या। तुम तो बस उगले जा रहे थे। बेजान शब्दों को जान देते हुए ...शब्द ...शब्द...अहा हीरे ...जवाहरात।तुम्हारा जाना एक चोट दे गया उन एक करोड़ उत्तराखण्डियों को जो तुम्हारे गीत गा-गा कर अलग राज्य के नागरिक बन गए। यह अजीब जज्बा तुमने ही तो भरा था उनके भीतर गाते गाते लडऩे का ... अजीब है न... पर यह किया तुमने ही...।मेरे जैसे कितने ही हैं जो तुम्हें साक्षात न देख सके लेकिन तुम्हें तुम्हारे गीतों, जन गीतों से जानते हैं। उन सबमें तुम जिंदा हो गिर्दा.... हमें लगता है कि तुम मिटे नहीं तुम चले गए हो कुछ समय के लिए और फिर लौटोगे ... गाते हुए ...
चलो रे नदी तट पार चलो रे...बहता पानी, चलता जीवन, थमा के हाहाकार चलो रे...
तुम गए नहीं गिर्दा यहीं ...कहीं हो... बस ओझल से हो... जब भी परेशान होंगे... तुम्हारे जन गीतों से ही पुकारेगे तुम्हें ... तुम आओगे न...क्योकि अभी लडऩी हैं हमने लंबी लड़ाई...तुम दोगे न साथ पहले की तरह... इस बार भी...

शुक्रवार, 20 अगस्त 2010

एक और राजधानी

देहरादून को धोखे से उत्तराखण्ड राज्य की राजधानी बनाने की बात अभी लोग भूले भी नहीं हैं की एक और राजनैतिक साजिश सामने आ गई। देहरादून को अस्थाई राजधानी बनाने के बाद यहीं जड़ें जमा कर बैठे हमारे माननीयों और नौकरशाहों ने अब एफिलिएटिंग यूनिवर्सिटी को देहरादून में ‘अस्थाई’ तौर पर जमाने का बीड़ा उठाया है। इसे लेकर गत मंगलवार को मंत्रीमंडल ने प्रस्ताव भी पारित कर हालाँकि नव प्रस्तावित को टिहरी के बादशाही थौल में खोले जाने का प्रस्ताव पारित किया गया, लेकिन वहां जिस स्थान पर इस यूनिवर्सिटी को खोले जाने की राय बनी है, वो कैम्पस केंद्रीय विश्व विद्यालय की संपत्ति है और क्या गारंटी है कि केंद्र सरकार अपनी संपत्ति को प्रदेश सरकार को दे ही दे। हालांकी मीडिया ने यह आशंका मंत्रीमंडल की बैठक की जानकारी दे रहे मुख्य सचिव एनएस नपल्चयाल के सामने भी उठाई। उन्होंने बताया की इस मामले में केंद्र सरकार को पत्र भेजा जाएगा।साफ है कि सरकार ने बादशाही थौल में जगह मिलने की उम्मीद के साथ ही कालेजों को संबदधता प्रदान करने वाले इस विश्व विद्यालय की स्थापना का निर्णय ले लिया। पहले ही सरकार के हाथों राजधानी के मामले में ठगे गए लोगों के लिए यह मामला ‘दूसरी राजधानी’ से कम नहीं है। कोई नई बात नहीं होगी कि बादशाही थौल के लोगों को अपना हक लेने के लिए बाद में आंदोलन का सहारा लेना पड़े।प्रदेश के 193 स्वपोषित कालेजों को संबद्धता प्रदान करने के लिए बनाए गए इस विश्व विद्यालय की अहमियत सरकार भी जानती है और अफसरशाही भी। जब तक बादशाही थौल में स्थान नहीं मिल जाता तब तक विवि को दून में ही चलाया जाए। मजेदार बात यह है की दून में भी अभी विवि के लिए कोई भवन चिन्हित नहीं किया गया है। विश्व विद्यालय के कुलपति से लेकर रजिस्ट्रार समेत कुल 19 पदों का सृजन किया जा चुका है। दरअसल बादशाही थौल में हेमवती नंदन बहुगुणा केंद्रीय विश्व विद्यालय के भवन पर सरकार की नजरें टिकी हैं । चूँकि यह भवन केंद्र सरकार की संपत्ति है इसलिए यह केंद्र पर निर्भर है कि वह अपनी इस संपत्ति को प्रदेश सरकार को सौंपती है या नहीं। सूत्रों का कहना है कि केंद्र आसानी से बादशाही थौल के परिसर को प्रदेश को नहीं सौंपने वाला। हालांकि प्रदेश सरकार ने इस प्रस्ताव के साथ एफिलिएटिंग विश्व विद्यालय के स्थापना की गेंद केंद्र के पाले में फेंक दी है। गेंद चाहे किसी के पाले में जाए एक बात तो साफ है कि प्रदेश सरकार ने दून में विवि का अस्थाई परिसर बनाने का निर्णय लेकर देहरादून में एक और राजधानी की नींव डाल दी है।

शुक्रवार, 13 अगस्त 2010

गुलामी

देखो अल्ताफ दो दिन बाद 15 अगस्त है। पूरे कैंपस को साफ करवा दो। वो सामने घास कटवा देना...वहां शाम को पार्टी का इंतजाम करना है। काकटेल तो अंदर ही करवा देंगे। इस तरफ पेड़ के नीचे दिन में झंडारोहण होना है...यहां एक भी पत्ता दिखाई न पड़े। गेट पर मेहमानों के आने के लिए कालीन डलवाना.... और हां अंदर कार्यक्रम के दौरान आसपास की बस्ती सें कोई बच्चा या आदमी न आने पाए... पिछली बार अपने साथ तमाम गंदगी ले आए थे...नामाकूल...तुम्हें और आदमियों की जरूरत पड़े तो बाहर से बुला लेना...
साहब सब हो जाएगा ...आप चिंता न करें... पर साब एक बात बतानी थी पिछले साल के तीन सौ रुपए अभी तक मजदूरों को नहीं दिए हैं।
यार तुम लोग एक एक पैसे के लिए मरते हो... तीन सौ रुपए एक साल से याद है तुझे... यहां इतना काम पड़ा है तू तीन सौ रुपल्ली के लिए रो रहा है... इस बार दूसरे मजदूर ले कर आना... उन्हें काम धाम कुछ नहीं आता...रुपए लेने के लिए चले आते हैं...साले
ठीक है साब...पर मजदूर सौ रुपए दिहाड़ी से नीचे नहीं मानते।
सौ रुपए...यह तो मजदूरी नहीं ब्लैक मेलिंग है...उन्हें 75 रुपए के हिसाब से देना और बिल मुझे दिखा कर बनाना...बाद में हिसाब ने बिगड़ जाए
साब 75 रुपए में तो नहीं हो सकेगा...तो फिर क्या पूरा खजाना खोल दूं उनके लिए...काम ही कितना है...करना है तो करें
ठीक है साब मैं अपने बच्चों को ही काम पर लगा लूंगा...पर साब पिछले साले के तीन सौ रुपए तो मिल जाएगें न
ठीक है तू अपने बच्चों को लगाएगा तो डेढ सौ रुपए ले जा...पिछला हिसाब बराबर।ठीक है साब...

बुधवार, 11 अगस्त 2010

कोख

बाढ़ का पानी उतरा तो सरकारी बाबू अपने ऑफिसों से निकल कर मुआवजा बांटने के लिए गांव में ही आ गए। बाढ़ के दौरान ही जो लोग शहर पहुंच सके थे उन्हें ऑफिसों में ही खुले दिल से मुआवजा बांट दिया गया था। बाबू रजिस्टर खोल कर नाम पुकारता और पीड़ित आगे बढ़कर अपना मुआवजा ले जाता। मुआवजा लेने वालों की भीड़ लगी थी। सब अपने अपने नाम की इंतजारी में थे। जैसे जैसे काम निपटने लगा, भीड़ के बीच खड़ी बुढ़िया की धडकनें बढ़ने लगीं। कई दिनों से कुछ न खाने के कारण पीला पला उसका चेहरा बाबू से बात करने के लिए तमतमाने लगा था। वह बड़ी उम्मीद से अपने नाम की इंतजारी कर रही थी। सब निपट गए... लोग अपने अपने घरों को लौट गए। अकेले खड़ी बुढ़िया को देख बाबू ने पूछा... ऐ क्या नाम है।सरबतिया...

बाबू ने रजिस्टर के पन्ने पलटते हुए पूछा- पति का नाम...

बुढ़िया ने शरमाते हुए बताया- लछमन...

बाबू ने पूरा रजिस्टर पलट दिया, लेकिन इस तरह के नाम का कोई पीडित उसे नहीं मिला, फिर बाबू ने पिछले पन्ने भी खंगाल दिए। एक जगह पर पेन लगाकर वोह रुक गया -अरे तेरे मरे का मुआवजा तो तेरा बेटा शहर आकर ही ले जा चुका है...पूरे पांच हजार रुपए मिले उसें... जा भाग यहां से... तू तो कागजों में मर चुकी है...बुढ़िया बाबू की बातों को हैरानी से सुन रही थी। उसकी जुबान तालू से चिपक गई, बिना कुछ बोले ही वह चुपचाप वापस लौट गई...शायद अपनी कोख को गाली दे रही थी...

गुरुवार, 5 अगस्त 2010

काट डालो सारे बांस

आईपीएल वाले मोदी तो शहीद हो गए, अब बारी है कॉमनवैल्थ वाले कलमाड़ी की। हमारी सरकार ने इन घटनाओं से सराहनीय सबक लिया है। उसने सतर्कता के साथ घोषणा कर दी कि वह ऐसे किसी भी खेल के आयोजन को अपने सिर नहीं लेगी जिसमें देश के इतने काबिल लोगों की बलि चढ़ जाए। आखिर मोदी और कलमाड़ी ने देश को बहुत कुछ दिया और उनका ही सार्वजनिक बहिष्कार वह भी दो कौड़ी के इन खेलों के चक्कर में यह तो बर्दाश्त करने लायक था ही नहीं। सरकार ने सापफ कर दिया कि भारत एशियाई खेलों के लिए होने वाली बोली में हिस्सेदारी ही नहीं करेगा। भाई साब! अपने देश की प्रतिभाओं के चेहरों पर स्वयं ही कालिख पोतने से तो अच्छा है कि इस प्रकार के आयोजनों को भारत में लाया ही नहीं जाए। पिफर देखते हैं कि हम पर कौन अंगुली उठाता है। अंगुली तोड़ न डालेंगे उसकी...। अब हमारा सर्वाधिकार होगा कि हम जब चाहे दूसरों का बना बनाया खेल बिगाड़ दें। वैसे भी हमारे पास ऐसे मीडिया तंत्रा तो है ही तिल का ताड़ बना दे। चौबीस घंटे तक समाचारों के नाम पर किसी की भी मुंडी मरोड़ने वाले हमारे चैनल दूसरों की कमियों को दिखाएगें तो उन्हें काम मिलेगा और हम दूसरों की छीछालेदर पर बल्लियों उछल रहे होंगे। सरकार एशियाओं खेलों की बोली में हिस्सा न लेने का ऐसा दांव खेलेगी यह तो किसी ने सोचा भी नहीं था। सचमुच धन्य हैं हमारी सरकार, न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी
तपन
08954024571

रविवार, 18 जुलाई 2010

एक दिन शायद

एक दिन
जब सड़ी हवा में सांस लेने से
आदमी डरेगा नहीं।
एक दिन
जब पेट भरने के लिए आदमी
कुछ करेगा नहीं।।
एक दिन
जब रोज रोज की दौड भाग से
परेशान शख्श जल्दी नहीं जागेगा।
एक दिन
जब छोटा बड़ा काम करके भी
बाबू रिश्वत नहीं मांगेगा।।
एक दिन
जब फूल दुर्गन्ध के लिए नहीं
महक के लिए विख्यात होंगे।
एक दिन
जब अंजाने नाम भी प्रेमचंद और
रविन्द्र नाथ से प्रख्यात होंगे।।
एक दिन
जब धरती पत्थर नहीं सोना उगाएगी।
एक दिन
जब विरहनी संयोग के गीत गायेगी।।
एक दिन
जब मशीन और आदमी
की प्रतिद्वंदिता नहीं होगी।
एक दिन
जब नई पीढ़ी में विचारों की
स्वच्छंदता नहीं होगी।।
एक दिन
जब बादल बिजली की जगह
सोना बरसाएंगे।।
एक दिन
जब हम-तुम तालाब में नंगे नहाएगें।।
एक दिन
जब कबूतरों को बाज
नहीं डराएगा।
एक दिन
जब राजनेता सिर्फ रोटियां खाएगा।।
एक दिन
जब अफसरों को कुर्सियां
नहीं होगीं।
एक दिन
जब दफ्तरों में तख्तियां नहीं होगी।।
एक दिन
जब रात
दिन से नहीं डरेगी।
एक दिन जब जिन्दगी के
फैसले खाप नहीं करेगी।।
एक दिन
जब आस्तीन के सापों का
डर नहीं होगा।।
एक दिन जब न्यायालय में
डाकू का घर नहीं होगा।।
एक दिन
जब परधानमंत्री आवास में गेट
नहीं होगें।
एक दिन
जब मजदूरों पर धौंस जमाते
घन्ना सेठ नही होंगे।।
एक दिन
जब अहसानों को हम उम्र
भर नहीं भूलेंगें।
एक दिन
जब फेल हुए बच्चे फांसी
पर नहीं झूलेंगे
एक दिन
जब सबके बच्चे घी और रोटी
खाएगें।
एक दिन
जब हम कसाब को फांसी
पर लटकाएगें।।
एक दिन
जब पेडों से आंसू
नहीं झरेंगे।
एक दिन
जब ग्लेशियर नहीं गलेंगें।।
एक दिन
जब नेता अपने गांव
लौट कर आएगा।
एक दिन
जब वोटर बिन दारू
के वोट डालने जाएगा।।
एक दिन
जब न्याय पैसे से
न तौला जाएगा।
एक दिन
जब मजदूर भरपेट
रोटियां खाएगा।।
शायद उस दिन
हम आदमी से
इंसान बन जाएंगे।
शायद उस दिन
हम अपने संस्कार
कर्मों में दिखलायेंगे।।
शायद उस दिन देश में
राम राज्य आ जाए।
शायद उस दिन
कोई देवता इस देश को चलाए।।
शायद.....

मंगलवार, 6 जुलाई 2010

धौनी की शादी में अब्दुल्ला दीवाने

लो जी... कुवारों टोली से एक नग और कम हो गया और हमारी टोली में जमा हो गया। शादी शुदा मस्ती में झूम रहे हैं, सो में भी खुश हूं... लेकिन अंदर से मैं बहुत दुखी हूं ...दो रातों से सो नहीं पाया दरअसल मुझे दुख मिश्रित गुस्सा है। धौनी की सगाई और शादी की लाइव कवरेज न देख पाने का। हांलाकि मीडिया से जुड़े भाई-बहनों ने तो हर संभव प्रयास किए पृथ्वी लोक की इस चर्चित शादी को दिखाने के... पर करते क्या उन्हें तो गेट से अंदर फटकने भी नहीं दिया गया। अन्दर मेहमान चिकन टिक्का गटक रहे थे और बाहर गेट पर खडे हमारे बंधुओं से मुहं का थूक भी नहीं थूका जा रहा था। वैसे धौनी ने किया तो अन्याय आ जाने देते उन्हें भी अन्दर, क्या फर्ख पडना था। हर फेरे के बाद दर्जनों माइक उनके मुंह के सामने होते और भाई पूछते... कैसा महसूस कर रहे हैं... बस... अब देखिए न फायदा तो धौनी को ही होना था दुनिया भर में शादी का सीधा प्रसारण मुफ्त में ही हो जाता, पर नहीं- धौनी ठहरे अडियल टाईप । पत्रकारों की छाया भी नहीं फटकने दी अन्दर। थके हारे भाई-बहनों की जान में जान तो तब आई जब दूल्हे के लिए सजी घोड़ी गेट पर पहुची। भाईयों ने घोडी वाले को थाम लिया... उसे मोबाइल देने लगे-बोले एक... दो फोटो ले आना। उन्हे तो घोड़ी वाले में ही भगवान दिखने लगा था। एक बहन ने तो उसका इन्टरव्यू ही कर लिया साहब। प्रसारण दूसरे चैनल के बॉस ने देखा, वह तो हत्थे से ही उखड़ गया। अपने पत्रकार की ठीकठाक झाड़-फूंक कर दी। बारात के बाद तो घोड़ी वाले की किस्मत खुलनी ही थी। गेट पर भाई-बहनों ने उसका अभूतपूर्व स्वागत किया। दर्जनों माइक उसके मुंह पर ठोक दिए गए... वह गलिया भी शानदार रहा था। एक पत्रकार पीछे रह गया तो मौका देख उसने माइक घोड़ी के मुंह पर ही लगा दिया... कैमरे में घोडी की क्लोज शॉट लेना शुरू कर दिया... पर घोड़ी कम्बखत बोली हीं नही वर्ना इतिहास रच जाता। हद है भाई... बोल घोडी वाला रहा है और कैमरे सजी धजी घोड़ी पर लाइन मार रहे थे । तब तक वरमाला लिए दूसरे साहब आ गए। दुकान से ही उनका पीछा किया जा रहा था सो गेट पर ध्र लिए गए... फूल कहां से आए... कौन-कौन से फूल है... कितने दिन पहले तोडे़ थे... कौन से ट्यूबवैल का पानी देते हो इन फूलों को... कौन सी माला किसे दोगे। इतने में एक की नजर गजरे पर पड गयी... चमेली का है क्या? दूसरे ने पूछा- फूलों की सुगंध् असली है या इत्र छिड़क रखा है... कितनी पंखुडियां हैं एक फूल में... कुल कितने फूल है...। बस हो गई एक्यक्लूसिव आइटम तैयार ...इतने सौ फूलों से बना गजरा, इतने हजार फूलों की वरमाला ... ब्रेकिंग न्यूज की पटटी के साथ टी वी स्क्रीन भी खुशबू बिखेरने लगा था। डीजे वाला अन्दर गया तो उससे अलग सवाल... कौन-कौन से गाने बजाओगे-बोला अगर आपने छोड़ा तो ही बजा सकूंगा वर्ना होटल वाले मेरा ही बैण्ड बजा देंगें। रिसार्ट के अन्दर की ओर जाने वाले हर व्यक्ति से पहले बात करने के लिए दर्जन माइकधरी दौड़ पडते कौन हो... अन्दर क्यों जा रहे हो... क्या-क्या लाए हो। मेहमानों के लिए बर्फ लाने वाले को भाई - बहनों ने तब छोड़ा जब उसकी बर्फ पूरी तरह से पिघल गई। शराब तो अन्दर तक पहुंच ही नहीं सकी... कैसे पहुंचती मीडिया की नजर थी, बड़ी खबर बनती सो शराब बार बनाए गए पर खाली ही रहे। अगले दिन मैनेजर को डांट जरूर पड़ी होगी। एक गाडी गेट पर खडी हुई एक साहब नीचे उतरे तो भाई बहनों ने घेर लिए- कौन है आप? पहला सवाल इतने कैमरे माइक देखकर वे हकलाने लगे मुंह से धे... ही निकला था कि पचासों सवाल हवा में उछल पड़े... कहां से आए है... किस की ओर से है... धेनी को कब से जानते हैं... शादी की खबर कैसे मिली... कार्ड आया था या फोन पर सूचना मिली थी.... कैसा कार्ड था...फोन किसने किया था...। टीवी स्टूडियो में उफंघते एनाउन्सरों ने भी मोर्चा संभाल लिया... देखिये एक मेहमान से मुलाकात। वहां से भी संवावदाता की मदद को सवालों की बौछार शुरू हो गई। भीड़ में फंसे सज्जन को गुस्सा आ गया। बोले- पूरी बात तो सुनो ...धोए हुए कपडे होटल में देने जा रहा हूं... सबकी बोलती बंद।
कुछ चैनलों के स्टूडियो से अलग से मेहनत हो रही थी। रविवार की रात को फेरों के मुहर्त निकलवा लिए गए पंडितों से... उसी हिसाब से बाकी रस्में तय कर दी गईं। साढे 11 बजे हुए फेरे चैनलों ने साढे सात बजे ही निपटा दिए।यही नहीं पंडितों को बिठा दिया गया कैसे मुहर्त में हो रही है शादी... कितनी सफल होगी... बच्चों का योग... जोड़ी खुश रहेगी... बन पाएगी दोनों की.... और तलाक कब तक...। सभी सवालों के जबाब हाजिर।भाई-बहन लगातार तीन दिन तक खाना-पीना सब भूल गए। एक भाई लघुशंका को गए, तब तक विवाह की छतरी वाला आ गया। जल्दी बाजी में भाई की पेंट ही गीली हो गई। किन्नरों को पता चला वे भी आ गए नाच गाना शुरु... लाइव टेलीकास्ट मुफ्त में। जो भी हो इस शादी ने घोडी वाले, डीजे वाले, माला वाले तीनों के रेट बढ़ा दिए। वे छोटी-मोटी शादियों में तो जाएगें ही नहीं । आखिरी सुबह तक भाई लोग डटे रहे होटल के गेट पर । जंगल में झिंगुर भी बोलता तो झपकी लेती आंख खुल जाती भाई-बहन माइक टटोलने लगते।धौनी-साक्षी दिल्ली रवाना हुए तो हमारे भाई बंधुओं ने ढाबे पर चाय पी और अपने घरों की राह पकड़ी। बीबी ने फ्रिज में रखा दो दिन पुराना खाना गर्म करके खाने की प्लेट सरका दी। बच्चे पूछ रहे थे- पापा ...धौनी कैसा है... साक्षी सुन्दर है... न... क्या बताते कि हम तो तीन दिन से अब्दुल्ला बने हुए थे।

गुरुवार, 1 जुलाई 2010

प्रतिशोध

राजनीतिकारों पर और देश के गद्दारों पर
साठ साल किया हुआ शोध बाँट रहा हूँ.
गाँव के चौबारों में और दिल्ली के गलियारों में
आम आदमी का प्रतिशोध बाँट रहा हूँ ।
कुर्सी की आग में जलेंगे सारे एक दिन,
इसीलिये लोगों में विरोध बाँट रहा हूँ
जानता हूँ फ़र्ख न पड़ेगा कोई फिर भी,
हिजड़ों के गाँव में निरोध बाँट रहा हूँ॥

रविवार, 27 जून 2010

हमारे पूर्वज
झंझावतों से लड़े
भिड़े,
मगर टूटे नहीं,
इसीलिए बूढा बरगद
खड़ा रहता है,
आपनी आन- बान और शान के साथ
हर बार कर देता है
ओनर किलिंग
अपनी मर्यादा की खातिर
मार देता है,
अपने ही बीज को
ताकि पैदा हो
अच्छी और बेहतर नस्ल
एक झटके में तोड़ देता है
बाधाएं,
किसी बान्ध की बाढ़ की तरह लड़ जाता है
पूरी सभ्यता से
अपनी इज्जत के लिए
और एक हम
यू के लिपितिस
उखड जाते हैं
बहते यौवानावेश में
कर देते हैं खून,
अपने ही खून का
चाची, भाभी या बहन
किसी भी रिश्ते का,
क्योंकि हम बरगद नहीं
यू के लिपितिस हैं,
सिर्फ
यू के लिपितिस



बुधवार, 21 अप्रैल 2010

बैसाख में आई, बहुत प्यासी है घुघती


बैसाख महीने में घरों के आसपास घुघती की 'बास' को नई नवेली बहुओं के लिए उसके मायके से लाया गया सन्देश समझना हमारी भूल हो सकती है... दरअसल इस महीने में पहाड़ी घरों के आसपास आवाज़ लगाने वाली घुघती प्यास से ब्याकुल है। वह तो पिछले महीने लोगों के सन्देश इधर से उधर करती रही और लोगों ने उसके आशियानों में ही आग लगा दी... पहाड़ के जंगल इस समय धूं -धूं कर जल रहे हैं और घुघती सरीखे लाखों बेजुबान प्राणी जान बचाने के लिए इंसानों की शरण में पहुच रहे हैं.... तुम्हीं ने दर्द दिया है तुम्हीं दवा देना की तर्ज़ पर पहाड़वासियों ने इन निर्दोष प्राणियों के दर्द को समझा हैं और उनकी प्यास बुझाने के लिए लगभग ख़त्म हो चुकी परम्परा को जीवनदान दे दिया है। अब पहाड़ों की ओखलियों में पानी भर कर रखा जाता है। पानी के बर्तनों को घरों के आसपास रखा जाने लगा है ताकि इन बेजुबानों की प्यास बुझ सके।
पछियों को क्या चाहिए चोंच भर पानी और दो चार दाने लेकिन पर्वतराज हिमालय के घने जंगल अपने इन आश्रितों के पेट भरने की स्थिति में भी नहीं हैं। मजबूरन पछी आबादी की और हसरत भरी उडान भर रहे हैं। पहाड़ के लोगों ने भी अपने दुःख सुख के इन साथियों की बोली को दिल से समझा और उनके लिए दाना-पानी का जुगाड़ करने के प्रयास शुरू कर दिए। दरअसल इस मौसम में दावानल से जंगल दहक रहे हैं। जहाँ आग नहीं है वहां गर्मी ने पछियों का जीना दूभर कर दिया है। नतीजा घुघती और उसके साथ के पछी अब ऊँचे पहाड़ों पर स्थित आबादी वाले स्थानों की तलाश में निकल पड़े हैं। दुखद यह है कि यही मौसम पछियों के लिए प्रजनन कल होता है। आग ने पछियों के तिनका- तिनका जोड़ कर बनाये गए घोसलों को भी जला दिया है। कौन जाने उनमे उनकी नयी पीढीयाँ भी साँस ले रही हों। घुघती जैसे पछियों ने अपने हलकों को तर करने के लिए इंसानों कि मदद मांगी और कई जगह उन्हें निराश नहीं लौटना पड़ा। घिन्दुड़ी यानि गौरैया के लिए हस्त निर्मित घोसले बनाने वाले प्रतीक पंवार इस स्थिति कि दर्दनाक बताते हैं। हो सकता हैं कोई घुघती आपके आँगन में भी आपसे मदद कि गुहार लगाने के लिए आये... उसका एहतराम जरूर करना....उसे इंसानी सभ्यता के नाते पानी देना और दो चार दाने अनाज भी खिलाना...शायद जिंदा रही तो आपकी बेटी को उसकी ससुराल में जाकर अगले साल चैत के महीने में वह आपकी खैर खबर जरूर सुनाएगी... फिर मिलते हैं...छत और आंगन में जरूर देखना .......


न
बासा घुघती चैत की, खुद लगीं च में म मैत की॥
या फिर
घुघती घुरौन लगी म्यार मैत की, बौडी बौडी ऐअग्ये रितु- रितु चैत की॥
इन दोनों गढ़वाली गीतों में दो चीजें समान हैं। एक घुघती दूसरा चैत का महीना। पुरानी कहानियों में घुघतियों के चैत के महीने में घरों के आँगन या छत पर घुरघुराने का मतलब नवविवाहिता को उसके मायके का सन्देश देनामाना जाता था। गढ़वाल और कुमाऊ में घुघती के माध्यम से विरह के दर्जनों गीत रचे गए हैं। इस तरह घुघती मानसिक रूप से उत्तराखंड के हर घर की सदस्य बन गयी... घुघती यानि प्यारी सी मासूम फाख्ता......

रविवार, 18 अप्रैल 2010

भक्ति में शक्ति

आस्था में कितना बल है यह शायद अब तक मुझे मालूम नहीं था, लेकिन शदी का पहला महाकुम्भ देख कर उस महा शक्ति के आगे नत मस्तक होने का मन करता है। जिसकी प्रेरणा से करोड़ों लोग पतित पावनी गंगा में एक डुबकी लगाने के लिए समुद्र की तरह हरिद्वार में उमड़ पड़ते हैं। इस बार भी १२ साल बाद हरिद्वार में लगने वाले महाकुम्भ में चार महीनों के दौरान लगभग ५ करोड़ लोगों ने गंगा में दुबकी लगाई। अंतिम शाही स्नान के दिन १४ अप्रैल को तो अकेले १ करोड़ 60लाख लोगों ने गंगा में डुबकी लगाई। इनमे से ५ लाख साधु संत थे। अंतिम शाही स्नान के दिन तो हरिद्वार में शायद ही कोई जगह होगी जहाँ हर हर गंगे के नारे लगाते लोग न दिखे हों। आपको विश्वाश नहीं होगा कि गंगा में सिर्फ तीन डुबकी लगाने के लिए श्रद्धालुओं को इतनी भीड़ में सरकते हुए १५-१५ किलो मीटर का फासला तय करना पड़ा। पर हद है आस्था को कि चिलचिलाती धूप में इतनी मुश्किल झेलने के बावजूद किसी ने उफ़ भी किया हो। हर तरफ गंगा मइया के जयकारे।
जुनून देखिये कि ऋषिकेश के त्रिवेणी घाट पर नहाने के लिए पहुंची मध्यप्रदेश की एक महिला ने गंगा को अर्ध्य दिया और गंगा की लहरों में लेट गयी। जब वह धारा में बहने लगी तो लोगों ने उसे जैसे-तैसे बाहर निकाला, लेकिन महिला लोगों के हाथों से छूट कर फिर से गंगा मैया में समा जाना चाहती थी। लोगों ने जैसे तैसे उसे हॉस्पिटल पंहुचाया। यह तो एक नजारा था। ऐसे न जाने कितने नज़ारे कुम्भ के दौरान देखने को मिले। एक महिला अपने तीन महीने के बच्चे को गंगा में डुबकी लगाने के लिए हर की पैड़ी में पहुंची। जब वह बच्चे के साथ गंगा में नहाने का प्रयास कर रही थी तो वहां खड़े पुलिस के जवान ने उसे देखा तो बच्चे को संभाला और महिला को गंगा स्नान का मौका दिया.शायद यह दुनिया का पहला मेला होगा की जब गंगा स्नान के समय धर्म और जाति व्यवस्था की सभी सीमायें तोड़ दी जाती हैं। यह उसी हिन्दू धर्म से जुड़ा धार्मिक मेला है जिस पर वर्ण व्यवस्था को लेकर सबसे ज्यादा आरोप लगाये जाते हैं। मेले के दौरान शायद ही कोई भारतीय हस्ती होगी जिसने गंगा में डुबकी लगा कर पुण्य न कमाया हो। सोनिया गाँधी को भी आना था लेकिन व्यवस्थाओं में खलल पड़ने की सम्भावना के चलते वे नहीं आईं। दलाई लामा, अडवाणी, गडकरी, हेमा मालिनी, अशोक चव्हाण, भजन लाल, मोहन भागवत, चन्द्र चूड सिंह, सुषमा स्वराज, बसुन्धरा राजे सिंधिया, अशोक सिंघल, प्रवीन तोगडिया तो कुछ नाम हैं। आपको बता दें कि कुम्भ मूलतः साधु संतों का मेला है लेकिन उनके दर्शन और गंगा में पुण्य कमाने का मोह ग्रहस्थ भी नहीं छोड़ पाते। माना जाता है कि कुम्भ के मुख्य स्नान में गंगा में डुबकी लगाने के लिए ३३ करोड़ देवी देवता भी हरिद्वार कि हर कि पैड़ी में पहुँचते हैं। मेले में सभी शंकराचार्यों के अलावा दक्षिण भारत के देवताओं के प्रतीक भी स्नान के लिए हरिद्वार लाये गए।
चार महीनों तक गंगा के १५ किलोमीटर तक बढ़ाये गए घाटों में शायद ही कोई दिन रहा हो जब भीड़ नहीं दिखी हो। हिमालय की कंदराओं में रहने वाले योगियों ने भी कुम्भ में डेरा डाले रखा। मेले की व्यवस्थाओं के लिए अंतिम दिन १३५ आई पी एस अधिकारी लगाये गए थे, उत्तराखंड की ८० प्रतिशत पुलिस जब कम पड़ गयी तो हिमाचल, पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश की पुलिस, पी ऐ सी, आर ऐ ऍफ़ , आई टी बी पी, बी एस ऍफ़ के अलावा डॉग स्क्वाड्स, बम स्क़वाड्स के हजारों विशेषज्ञ तैनात किये गए थे। कुम्भ का अंतिम शाही स्नान निपट चुका है, लेकिन अभी मेला २८ अप्रैल तक चलेगा। लाखों लोग अभी भी मेले में आ रहे हैं। हालत यह हो गयी कि अंतिम शाही स्नान के दिन उत्तराखंड सरकार को पडौसी राज्यों से आने वाले श्रधालुओं को अपना कार्यक्रम एक दो दिनों के लिए टालने का आग्रह करना पड़ा।
कुम्भ मेले में शामिल होने के लिए लाखों कि संख्या में विदेशी मेहमानों ने भी हरिद्वार में डेरा डाला। कुछ तो साधु ही बन गए। गंगा में स्नान के बाद उनका उत्साह देखते ही बनता था। एक मात्र हिन्दू देश नेपाल से भी हजारों की तादाद में हरिद्वार ऋषिकेश पहुंचे।