रविवार, 29 अगस्त 2010

आओ न कुछ बात करें


कु अटक रहा था मन में, खटक रहा था जैसा भी आया आपको सौंप रहा हूं.... देखें तो जरा

किसका घूंसा - किसकी लात, आओ न कुछ बात करें...
होती रहती है बरसात, आओ न कुछ बात करें।

अगर मामला और भी है तो वो भी बन ही जाएगा,
छोड़ो भी भी ये जज्बात, आओ न कुछ बात करें।

नदी किनारे शहर बसाना यूं भी मुश्किल होता है,
गांव के देखे हैं हालात, आओ न कुछ बात करें।

इक इक- दो दो घूट गटक कर सैर करेंगे दुनिया की,
पैसे देंगे कुछ दिन बाद, आओ न कुछ बात करें।

बूंद-बूंद ये खून बहा कर क्यों प्यासे रह जाते हो,
बांटे जीवन की सौगात, आओ न कुछ बात करें।

तुम गैरों के हो गए तो क्या! प्यार हमेशा रहता है,
कौन रहा जीवन भर साथ, आओ न कुछ बात करें।

नींदों को पलकों पर रख कर छत पर लेटे रहते थे,
फिर आई वैसी ही रात, आओ न कुछ बात करें।

कमर तोड़ती है सरकार चाहे जिसको कुर्सी दो,
कैसा फूल और किसका हाथ, आओ न कुछ बात करे।

1 टिप्पणी:

  1. प्रिय बंधुवर तेजपाल नेगी जी

    बहुत ख़ूब जी बहुत ख़ूब !
    आओ न कुछ बात करेंअच्छा लिखा है …

    बूंद-बूंद ये खून बहा कर क्यों प्यासे रह जाते हो,
    बांटे जीवन की सौगात, आओ न कुछ बात करें।

    नींदों को पलकों पर रख कर छत पर लेटे रहते थे,
    फिर आई वैसी ही रात, आओ न कुछ बात करें।


    प्यारा अंदाज़ है
    तुसी तो छाऽऽ गये बाऽश्शाओऽऽ !
    मुबारकबाद …

    - राजेन्द्र स्वर्णकार

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