रविवार, 21 जुलाई 2013

पिता का पत्र बेटे के नाम

प्रिय बेटे,
जुग जुग जियो! उत्तराखण्ड के हाल तो तुमने देख सुन ही लिए होंगे। तुम्हारे साथ के बहुत से वीर जवानों ने हमारे भाई बहनों को बचाया, निकाला। फिर भी उनके आने से पहले कई लोगों को मौत छीन ले गई। तुम्हारी बड़ी बेटी नीलिमा उस दिन के बाद से लापता है। हमने आसपास के जंगलों में उसे बहुत ढूंढा, नदियों के किनारे भी तलाश किया। अब आधे गांव में बिछे मलबे को तलाशना बाकी है। मन तो नहीं मानता लेकिन आस टूट रही है, बेटा। तुम्हारी मां और बहू तब से न कुछ खा रहे हैं और न ही पी रहे हैं। बहू नीलिमा की स्कूल की किताबों को समेट कर उसका इंतजार कर रही है। क्या कहूं उससे...समझ में नहीं आ रहा। अस्सी साल का हो गया ऐसी विपदा पहले न कभी देखी न सुनीं। हमारा आधा मकान भी बाढ़ में ढेर हो गया। आधे मकान में रहने में डर लगता है। बाढ़ ने पशुशाला को उजाड़ दिया। रमिया गाय, उसकी बछड़ी सूमा, भैंस भानु सब बह गए। रमिया की लाश तो कुछ दूरी पर मलबे में मिल गई। बाकी पशुओं का कोई पता नहीं चला है। आपदा के बाद की कुछ रातें गांव वालों के साथ हमने भी घर से दूर जंगल में काटीं। अब वापस लौट आए हैं।

क्या करें बेटा यहां से जाएं, तो जाएं कहां। रात को जब नदी हुंकारें मारती है तो दिल सिंहर जाता है। बहू फिर उम्मीद से हैं, ऐसी हालत में यदि और तबाही होती है तो क्या होगा। तुम होते तो कुछ मदद मिलती, पर क्या करें तुम सेना में हो, तुम्हारे साथियों ने हमारे हजारों लोगों की जान बचाई है, तुम अपनी ड्यूटी अच्छी तरह से बजाना, सेना का कर्ज हम उत्तराखण्डी ऐसे ही उतार सकेंगे। बेटा गांव का पोस्ट आफिस भी बह गया है। तुम मनी आर्डर भेजोगे तो मिलेगा नहीं। हां सरकार ने कुछ रुपये दिए हैं। पूरे चार दिन चक्कर काटता रहा पटवारी के दफ्तर के, तब जा कर पैसे मिले। घर में साल भर के लिए जमा करके रखा हुआ गेहूं- चावल सब बर्बाद हो गया है। डर है आगे खाने के लाले न पड़ जाएं। पर तुम परेशान मत होना, जैसे गांव रहेगा वैसे ही हम गंवार भी रह लेंगे।

पड़ोस वाले सतिया चाचा का बाढ़ में पूरा मकान बह गया। घर के चार लोग मारे गए हैं । एक बुढिय़ा ही बची है। पागल सी हो गई है बेचारी। मरने वालों का नाम तक नहीं बता पा रही है वह। बेटा मस्कट में है। पता नहीं उसे मालूम भी है या नहीं। बेटा इस आपदा ने हमारे गांव को बर्बाद कर दिया। हर घर से एक दो लोग गायब हैं। खेतों में बड़े बड़े पत्थर और रेत भर गई है। लगता नहीं कि अब वहां फसल भी पैदा कर पाएंगे। गांव का रास्ता बह गया है। झूला पुल भी बह गया। कुछ नहीं बचा बेटा यहां। गांव के आधे लोग लापता हैं। सुना है कई लाशें गंगा में इलाहाबाद तक पहुंची हैं। कौन जाने हमारे कितने लोग होंगे उनमें। बेटा, जिस खेत में गेंहू कटने के बाद तुम लोग साथियों के साथ खेलते थे, वहां पशुओं की लाशें बिछी मिली है। गांव का भूमिया देवता का पुराना पेड़ भी बाढ़ को कैसे झेलता, वह भी जड़ से उखड़ गया। कई पक्षियों का ठिकाना था उस पर, और शिव जी का वो पुराना मंदिर! वहां तो मलबे के अलावा कुछ नहीं। देवता की पूजा में न जाने कौन सी कमी रह गई हमसे। नई फसल पर रोट चढ़ाते, पशुओं का दूध पहले अर्पित करते और हर काम में पहले उन्हें ही पूजते। लोग कह रहे हैं देवता नाराज हुए, कोई कहता है पड़ोसी देश ने किया यह और कोई कहता है बांधों की वजह से हुई तबाही, जितने मुंह उतनी बातें।

तुम्हारी मां बीमार रहती हैं, तुम्हारी बहन की शादी की तैयारी कर रहे थे, अब वह भी नहीं हो पाएगी। सुना है वहां भी तबाही हुई है। एक दिन पटवारी आये थे, लिखकर ले गए हैं कितना नुकसान हुआ, कहते हैं पैंसे मिलेंगे, इससे क्या होगा, मरने वालों की कमी पैसे ही पूरी कर देते तो मौत को खरीद न लेता इंसान। कुछ बिस्कुट के पैकेट और बोतल बंद पानी दे गए थे। मुंह पर बांधने को कपड़ा भी दिया। बोले महामारी का खतरा है। बेटा महामारी फैली तो शायद गांव में कोई भी न बचे। भगवान ऐसा नहीं करेंगे यही उम्मीद है। तुम्हारे दादा परदादा की सारी मेहनत पर कुछ ही देर में रेत बजरी फिर गई है। नया गांव कैसे बसेगा...समझ में नहीं आ रहा। बेटा, पहाड़ तो होते ही दर्द सहने के लिए हैं फिर पहाड़ी भी कैसे दर्द से दूर रहते। हमें पहाड़ों ने चुपचाप दर्द सहना सिखाया है और यह चिट्ठी लिखते समय आशा करता हूं कि तुम भी इस दर्द व दुख को सहने की हिम्मत जुटा पाओगे। सेना में हो मुश्किल घड़ी में कैसे हिम्मत जुटानी है तुम हमसे ज्यादा जानते हो। बेटा क्या लिखूं कुछ समझ नहीं आ रहा है। तुम अपना फर्ज अच्छी तरह से निभाना, जो होना था हो गया। अब तो बस भगवान का ही आसरा है। लौटोगे तो जरा छुट्टी लंबी लेकर आना, बहुत काम करना है यहां। बस अब नहीं लिखा जाता, दिल भर आता है।

भगवान बदरीविशाल तुम पर कृपा बनाए रखे।
तुम्हारा पिता।

(संकल्पना)

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