बुधवार, 17 अगस्त 2011

हां मैंने अन्ना को देखा है


अन्ना हजारे को जेल की सलाखों के पीछे पहुंचा कर केंद्र सरकार ने उन लोगों को हमला करने के लिए आमंत्रित कर लिया जो शुरू से ही मनमोहन सरकार पर तानाशाही का आरोप लगा रहे थे। हजारे की गिरफ्तारी करने की योजना बनाते समय संभवतः सरकार के मन आंदोलन की गंभीरता का अंदाजा नहीं था, या फिर सरकार के नीति निर्धारक जनता के मन को पढ़ने में कहीं चूक कर गए। वर्ना यदि देश के हालातों का सही जायजा लगाने वालों को सानिया गांधी अपने नजदीक रखतीं तो ऐसी स्थिती नहीं आती। आजादी की वर्षगांठ की अगली ही सुबह देश में जो जंग शुरू हुई है उससे पार पाना सरकार के लिए कम से कम आसान काम तो नहीं है। दुर्भाग्यपूर्ण ढंग से यह कहा जा सकता है कि फिलहाल देश के मंत्री मंडल में कोई ऐसा शख्स नहीं बचा रह गया है जिस पर जनता विश्वास करने को तैयार हो। कल सुबह लगभग आठ बजे अन्ना के गिरफ्तार करने की खबर देश में फैली ठीक तब से लेकर आज घटना के लगभग 36 घंटे बाद भी ऐसा नहीं लग रहा कि हम देश का 67 स्वाधीनता दिवस मना कर अगली सुबह देख रहे हैं। हर मोहल्ले, चैक, हाईवे, बाजार में तिरंगा लिए लोग जब स्वतः स्फूर्त होकर निकलते हैं तो आजादी ेस पहले के आंदोलन की कल्पना साकार होती दिखाई पड़ती है।
कांग्रेस या सरकार चाहे माने या माने लेकिन यहां पर अन्ना का जादू पार्टी और सरकार के एक से एक आकर्षक चेहरे के जादू के भारी पड़ गया है। कांग्रेस के युवराज का तेजोमयी चेहरा, अन्ना के बूढ़े चेहरे के सामने फीका दिख रहा है। सोनिया गांधी तो खैर देश में हैं ही नहीं। गांधी परिवार की कांति इस गांधीवादी के सामने फीकी पड़ गई है। यह तो अन्ना हजारे की गिरफ्तारी के दूसरे दिन का हाल है।
दरअसल महात्मा गांधी के रास्ते पर चलने की 65 वर्षों से अपील करते करते कांग्रेस और उसके नेता भूल ही गए कि गांधी की राह आखिर थी कौन सी। गांधी के दर्शन को समझने वाले न अब कांग्रेस में बचे और न सरकार में। एक कवि ने कभी कहा था कि -गांधी के पदचिह्न आज भी अछूते पड़े हैं....क्योकि उन पर कोई चला ही नहीं। यही कुछ हुआ कांग्रेस के साथ गांधी के कदमों को नापने का दावा करने वाली कांग्रेस अनशन, भूख हड़ताल आदि जैसे शब्दों से बहुत दूर जा चुकी है। दिग्विजय सिंह से लेकर कपिल सिब्बल तक पढ़े लिखे कांग्रेस के नीति निधार्रक स्वयं को ईश्वर मान बैठें तो पार्टी का यही हश्र होना था।
जनता के वोट से चुनकर संसद में पहुंचने वाले हमारे नेता जनता को ही भूल जाते हैं। इस आरोप को साबित करने के लिए अन्ना के आंदोलन पर हमारे नेताओं की टिप्पणियों से अच्छा कोई उदाहरण नहीं हो सकता। पिछले एक अरसे से हमारे राजनीतिज्ञों ने टीम अन्ना द्वारा तैयार लोकपाल बिल के प्रारूप को लेकर जो भी टिप्पणियां की हैं वे सभी उनकी ओर से स्वयं को परमसत्ता साबित करने जैसा ही लगा। अब जब अन्ना और सरकार के बीच महाभारत का निर्णायक संग्राम शुरू हो चुका है तो आम जनता के इस महासंग्राम में कूदने से सरकारी पक्ष हल्का महसूस हो रहा है। भारत की जनता आज आजादी की दूसरी लड़ाई को जी रही है। अन्ना के एक एक शब्द का देश की जनता अक्षरशः पालन कर रही है। ठीक वैसे जैसे कभी लाल बहादुर शास्त्री की अपील पर जनता ने एक दिन का व्रत रखना शुरू कर दिया था, या गांधी जी के कहने पर असहयोग आंदोलन को पूरे देश में समान रूप से जन समर्थन मिला था।
अन्ना और गांधी में काफी कुछ अंतर होते हुए यही एक समानता है कि उनके चेहरे पर छायी सादगी पर आम आदमी मर मिटने का तैयार हो जाता है। अन्ना और बाबा रामदेव के आंदोलन के बीच काफी कुछ समानता होते हुए भी यही अंतर था। बाबा रामदेव भव्यता पर जोर देते थे, और अन्ना सादगी पर ध्यान देते है। लालबहादुर जैसी कर्मठता अन्ना बार बार दिखा भी चुके हैं और उनका आंदोलन जिस दिशा में बढ़ रहा है उसे देख कर तो जय प्रकाश नारायण की यादें भी लोगों की आखों में तैरने लगी हैं। लेकिन देश की नई पीढ़ी जिसने गांधी से लेकर जय प्रकाश तक को नहीं देखा उनके लिए अन्ना में ही गांधी है, अन्ना में ही लाल बहादुर या सुभाष चंद बोस हैं, देश की यह आम जनता अपनी आने वाली पीढ़ी को शान से अन्ना की आजादी की इस दूसरी लड़ाई के किस्से सुनाएगी और कहेगी..... हां मैंने अन्ना को देखा है।

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