मंगलवार, 1 अप्रैल 2014

यह है राजनीति का संक्रमणकाल


इसे भारतीय राजनीति का संक्रमण काल ही कहा जाएगा। जब परंपरागत राजनीति का आधुनिक व नई सोच की विचारधारा अधिगृहण कर रही है। बेशक मनमोहन सरकार लगातार शासन करने का रिकार्ड अपने नाम कर गई और इसमें भी कोई दो राय नहीं कि उसके पास देश के सबसे चर्चित व महत्वपूर्ण परिवार से आने वाले वाले दमकता चेहरा रहा हो। चालीस के आसपास के राहुल को आधुनिक तो माना ही जा सकता है। लेकिन उनके काम काज से तो यही लगा कि वे सतता के मायाजाल से न कभी बंधे और न ही उन्होंने कभी राजनीति में रुचि ली। उनका राजनीति से सन्यासभाव ही कांग्रेस की इस गत के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार है। दावे से यह भी नहीं कहा जा सकता कि नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बन जाने से देश वैसा ही चलने लगेगा जैसा कि आम मतदाता उनके नाम पर वोट देने का विचार करते समय सोच रहा है। भाजपा में परंपरागत राजनीति करने वालों की कमी नहीं। स्वयं मोदी भी क्या यह बता सकते हैं कि दिल्ली में कांग्रेस और भाजपा दोनों की जंग में यदि केजरीवाल अपनी ताकत साबित न करते तो इन लोकसभा चुनावों के की यह तस्वीर निखर कर सामने आ पाती। दरअसल आम आदमी पार्टी का दिल्ली में उद्भव भारत की राजनीति में अचानक हुए इस बदलाव की नींव कहा जाना चाहिए।  यदि यह सही नहीं है तो क्या अमेठी में राहुल गांधी के खिलाफ भाजपा स्मृति ईरानी को टिकट देती। यह भी तो नई राजनीति है। पर सवाल यह है कि अरविंद केजरीवाल को अभी भारतीय राजनीति के दांव पेंच सीखने बकाया है। उन्हें भारतीय जनता ने जो मान सम्मान दिया है वह उनकी सादगी की वजह से है। इस सादगी का वरण मोदी ने अभी तक तो नहीं किया है।  इसलिए आने वाले कुछ समय और भारतीय राजनीति को इस संक्रमणकाल से गुजरना होगा। तब कहीं जा कर देशहित में काम करने वाले युवा नेताओं की सेना तैयार होगी। तब तक सिवाए प्रतीक्षा के कुछ किया भी नहीं जा सकता।

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