मंगलवार, 8 जनवरी 2013

सावधान! बापू उवाच रहे हैं

लो जी! अब बापू बोले और बोले तो क्या धांसू बोले। जब तक रील पूरी तरह नहीं धुल गई तब तक बोलते रहे। बोले- क्या जरूरत थी आधी रात को चलती बस में छेड़छाड़ कर रहे छह-छह मुस्टंडों की खिलाफत करने की। भैया बोल देती तो पसीज जाते बेचारे। भारतीय रिश्तों की मान मर्यादा को शराब के नशे में आदमी भूल थोड़े ही जाता है। आखिर अपनी बहन बेटियों का ख्याल तो उसे रहता ही है। फिर बस में मिली धर्म बहन को कैसे भूल जाते। बापू बोले- जब घिर ही गई थी छह पुरुषों के बीच तो हाथ जोड़ कर बचने का जुगाड़ कर लेती। शायद बापू ने हाल ही में अमरीश पुरी या फिर रंजीत की किसी हिंदी फिल्म का आधा सीन देख लिया। जिसमें अस्मत लूटने को तैयार विलेन के सामने हीरो की बहन हाथ जोड़ती हैं, गिड़गिड़ाती है...इससे आगे का सीन उन्होंने नहीं देखा। बस बापू लगे हवस के भूखे भेडिय़ों के सामने हाथ जोड़ कर गिड़गिड़ाने की नसीहत देने। बापू के भक्त गद्गद हैं, उनके प्रवचन पर। 
सवाल है भारतीय संस्कृति के यह ध्वज वाहक शायद वेदों में वर्णित मां चंडिका के रूप से भूल गए। गैंगरेप पीडि़ता अपने दुश्मनों पर विजय प्राप्त भले ही नहीं कर सकी हो लेकिन उसने लाखों अबलाओं को सबला जरूर बना दिया है। आने वाले दिनों में यही सबला बापू के लिए बला न बन जाएं....


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